मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

नमस्कार। आप सभी को विजया दशमी की शुभकामनाएँ। आशा रखता हूँ कि त्यौहारों का यह मौसम आपका अच्छा बीत रहा है। विजया दशमी बुरे पर अच्छे के जीत को दर्शाता है। मेरा विश्वास है कि अंत में अच्छाई की जीत होती है। पिछले महीने हमने हार्वर्ड के  प्रोफेसर बेन -शहर के पाँच मंत्रों का जिक्र किया था जो कि इंसान को और ज्यादा खुशियाँ दे सकता है। जिन्होंने पिछला लेख नहीं पढ़ा होगा उनके लिए एक बार फिर पाँच सन्देश, प्रोफेसर का -आपके पास जो भी है उसके लिए ईश्वर का शुक्रगुज़ार रहो। शारीरिक एक्सरसाइज रोज जरूरी है। दिन का सबसे महत्वपूर्ण है ब्रेकफास्ट। assertive बनना सीखें। अभिज्ञता अर्जन करने के लिए पैसे निवेश करना आवश्यक है।  इस लेख में और पाँच सुझाव का ज़िक्र करूँगा जो मैंने प्रोफेसर के विषय में लिखे एक व्हाटस एप्प मैसेज से सीखा है। यह लेख उस व्हाट्स एप्प मैसेज से अनुप्राणित है। मूल विचार जो प्रोफेसर बेन -शहर का है उस पर मैंने अपनी ज़िन्दगी के सीख से भी सवाँरा है।
ज़िन्दगी में कठिनाई आएँगी। उनका जल्द सामना करना जरूरी है। जितना आप कठिनाई से जूझने में देरी करोगे उतना ज्यादा दर्द आपको सहना पड़ेगा। रिसर्च यही बोलता है। जितना विलम्ब उतना टेँशन। हर हफ्ते के लिए छोटे टास्क लिस्ट्स बनाए और उसे ख़त्म कीजिए। इसी में मंगल है।
आपके चारो ओर ख़ुशी के याददाश्त से भर दें। अपने चाहने वालों की तसवीरें , पुरस्कार जो आपने जीते होंगे , खुशियों वाली उपहार। क्यों ऐसा करना जरूरी है ? किसी के भी ज़िन्दगी में गम से ज़्यादा खुशियाँ हैं। परन्तु हम अपना चिंता ज़्यादा गम पर करते हैं। खुशियों का आनंद नहीं ले पाते हैं। मन खुशियों से और खुश होता है। केवल गम के विषय में सोचकर नहीं।
हमेशा दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करें। पहली बार दिन में मिलते वक़्त विश करें। आपके मुस्कुराहट का जवाब मुस्कुराहट से मिलेगा। मुस्कुराने से एनर्जी बढ़ती है। और एनर्जी ही ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सम्पद है। अक्सर हम किसके साथ मुस्कुरा कर बात करेंगे इसका एक मन ही मन चयन कर लेते हैं। इसके फलस्वरूप हम कम लोगों के साथ मुस्कुराते हैं। और यहीं खुद का एनर्जी कम कर लेते हैं।
डॉ वापनेर जो कि अमेरिकन ऑर्थोपेडिक्स एसोसिएशन  के प्रेसिडेंट हैं कहते हैं की हमारे मूड का निर्धारण करने का एक महत्वपूर्ण वजह है हमारे जूते। जूते पहनकर अगर कोई दर्द महसूस करें या हमारे चलने में कोई असुविधा हो तो हमारा मूड ख़राब हो जाता है। मैंने कभी भी इस विषय में इस तरह से नहीं सोचा था। लेकिन जब मैं अपनी ज़िन्दगी के सफर के साथ इस टिप्पणी को जोड़ूँ तो यह एकदम सही नज़र आता है। नए जूतें जब तक अपने पाँवों पर सेट नहीं हो जाते हैं ,मूड नहीं बनता है।
मुंशी प्रेमचंद का एक बेहतरीन लेख था -रीढ़ की हड्डी। अगर हम अपने रीढ़ की हड्डी को सीधा नहीं रख सकते हैं तो ज़िन्दगी में कॉन्फिडेंस का अभाव रहेगा और कॉन्फिडेंस के बिना मूड नहीं बनता। ज़िन्दगी का आधा से ज़्यादा मजा तो सेल्फ कॉन्फिडेंस देता है। इसके बिना जीना ही बेकार है। आपके चाल से अक्सर लोग आपके बारे में अपना धारणा बनाते हैं। अगर आप कॉंफिडेंट दिखें तो आपके आस पास के लोग भी आपको उसी तरीके और अंदाज़ से पेश आएँगे।
अगले महीने अंतिम चार टिप्पणियाँ प्रोफेसर के। तब तक खुश रहिए और दिवाली खुशियों के साथ बिताइए। ख्याल रखिए ज़िन्दगी से और बहुत कुछ  पाना है। ख़ुशियाँ हम सबके हातों में है। केवल उसे समझना पड़ेगा और प्रोफेसर के दिए गए टिप्पणियों को प्रयोग कर के और बढ़ाना है।





शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

बारिश का प्रकोप हमारे देश के अलावा इस वक़्त अमेरिका में भी बहुत भयंकर है। काफी नुकसान पहुँचा है लोगों को और उनके संपत्ति को। जिन लोगों को असुविधा हुई है उनको अब महसूस होता है दुसरों पर क्या बीती होगी ऐसी परिस्थितयों में। हम अक्सर दूसरों के दुःख या कठिनाई को तब महसूस करते हैं जब हम खुद उस कठिनाई से गुजरते हैं।
हर इंसान खुश रहना चाहता है। हम कोशिश करते हैं कि हम वैसा सब कुछ करें जो कि हमें खुशियां दे। परन्तु क्या हम खुश हैं ? शायद नहीं। इसी कारण आज और अगले कई महीनो में मैं चर्चा करूँगा कि हम और ज्यादा कैसे खुश रह सकते हैं ? मैं बात करूँगा प्रोफेसर बेन शहर का जो कि विश्व के प्रसिद्द हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं how to learn to be happier ? आंकड़ो के मुताबिक हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जितने लोग पढ़ने आते हैं , उनमे से २० प्रतिशत लोग प्रोफेसर शहर का यह पाठ्यक्रम में जरूर दाखिला लेते हैं। प्रोफेसर के मुताबिक उनका क्लास ख़ुशी ,आत्मसम्मान और मोटिवेशन पर केंद्रित है। उनका विश्वास है कि इसके कारन विद्यार्थिओं को सफलता और आनन्द पाने में सुविधा होती है। प्रोफेसर को लोगों ने  'happiness गुरु ' का भी उपाधि दिया है।
प्रोफेसर अपने ज़िन्दगी को सुधारने के लिए और ज़िन्दगी में पॉजिटिव प्रभाव डालने के लिए १४ उपाय का ज़िक्र किया है। इस लेख में मैं पहले पाँच  उपाय का ज़िक्र करूँगा।  बाकि आगे के लेखों में।

  1. आपके पास जो है , जितना भी है , उसके लिए पहले ईश्वर को धन्यवाद दीजिए। एक कागज पर उन १० चीजों को लिख लीजिए जो कि आपको आनंद देता है। उन चीजों पर ज्यादा समय बिताइये और नज़र डालिए। इसी में आपका आनन्द बढ़ेगा। 
  2. शारीरिक चर्चा अवश्य कीजिए -रिसर्च कहता है कि शारीरिक एक्सरसाइज आपका मूड बेहतर करता है। तीस मिनट का एक्सरसाइज दुःख और स्ट्रेस को घटाता है।  यह प्रमाणित है। 
  3. सुबह का नाश्ता जरूर कीजिए -कुछ लोग समय के अभाव के कारन या मोटापा घटाने के उद्देश्य से ब्रेकफास्ट नहीं करते हैं। यह गलत करते हैं। रिसर्च कहता है कि ब्रेकफास्ट आपको एनर्जी देता है जो आपको सोचने में मदत करता है और आपको अपने काम को सफलता के साथ करने में मदत करता है।
  4. assertive बनिए -चाहिए जो आप चाहते हैं। कहिए जो आप सोचते हैँ। assertive होने से आपका आत्मसम्मान बढ़ेगा। चुप रहने से या किसी चाहते हुए चीज का हिस्सा ना बन सकने पर आपको आपको उदासी महसूस होती है। और हम उम्मीद और हौसला खो देते हैं। 
  5. तजुर्बा बढ़ाने के लिए पैसे खर्च कीजिए -७५ प्रतिशत लोग जिन्होंने निवेश किया है सफर करने में ताकि नए जगह और लोगों से सीख सके या कोई नए विषय का अध्ध्यन करें ;उन्हें ज़िन्दगी से अधिक आनन्द मिला है। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हे चीज़ें खरीदने पर ज़्यादा आनंद महसूस हुआ है। 
काफी चीज़ें जिसका ज़िक्र प्रोफेसर ने किया है , हम करते हैं। प्रश्न जो हमें खुद से करना है कि हम अपना कितना समय इन चीज़ों पर देते हैं और कितना समय हम उन चीज़ों को देते हैं जिसके कारन हमें ख़ुशी नहीं मिलती है। पड़ोसी ने वही गाड़ी खरीदी है जो कि आपका सपना है। हम ईर्ष्या ज्यादा करते हैं नाकि खुश होते हैं उनकी सफलता पर। 
अगले महीने पाँच और उपाय प्रोफेसर के। तब तक केवल खुद का एक मूल्यांकन कीजिए आप assertive हैं या नहीं ?मेरा तजुर्बा कहता है कि हम अधिकतर लोग assertive नहीं है। बनना कठिन है। बन जाने पर ज़िन्दगी से अवश्य ज़्यादा आनंद मिलता है। कोशिश कीजिये। आप अपने आपको एक नए अंदाज़ से देखिएगा। यही ज़िन्दगी है। हर सुबह एक नई सुबह। खुद नए अंदाज़ में क्यों नहीं !

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

पिछले महीने में मैंने रिश्तों के विषय में चर्चा किया था। मेरा मूल सन्देश रिश्तों में एक दूसरे को पर्याप्त स्वाधीनता देना था। क्या अपने रिश्तों में स्वाधीनता का प्रयोग किया है मेरे लेख को पढ़ने के बाद ? फायदा दिख रहा है ? रिश्तें मजबूत बन रहें हैं ? मजबूत रिश्ते अक्सर इंसान को उदास करते हैं।
जैसा की मुझे। इस वक़्त। मेरा छोटा बेटा ग्रेजुएशन के लिए आज अमेरिका के लिए रवाना हो रहा है। घर पे उदासी है। इतना दूर जा रहा है। दोस्त और रिश्तेदार का कहना है -ग्रेजुएशन इंडिया में करना चाहिए था -उसके बाद विदेश में पढ़ना बेहतर होता -जैसा कि मेरे बड़े बेटे ने किया था।
क्यों उदास हूँ मैं ? ऐसे तो बेटा पढ़ाई लिखाई ,गिटार ,दोस्त लेकर व्यस्त ,मैं अपने काम और कई और चीज़ों को लेकर व्यस्त। कितना समय एक साथ गुजारते हम। दिन में एक घण्टा औसत में। बच्चे बड़े हो जाने पर अपना स्वतंत्रता चाहते हैं जिसका मैंने ज़िक्र किया था। और जो मैंने दिया है। रिश्तों का एक महत्वपूर्ण सीख है इस अनुभूति में- ज्यादा समय साथ में नहीं गुजारते हैं जब कोई पास है ,परन्तु दिल नहीं चाहता है कि वह दूर जाए। यह रिश्ते के मजबूती को दर्शाता है। ज़िन्दगी में कई लोगों के साथ रोज का मिलना -जुलना होता रहता है ,लेकिन वह अगर हमसे दूर हो जाएँ तो कुछ ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता है। कई और लोग होते हैं -खासकर सच्चे दोस्त -जिनके साथ सालोँ से मुलाकात नहीं होती हैं ,लेकिन हमें पता रहता है ,कि वह हमारे लिए है ,कभी भी ,कहीं भी -ना मौजूद रहने पर भी ,दिल से करीब है। यही रिश्ते अति मूल्यवान हैं। इन्हे संवारना ज़िन्दगी के लिए ज़रूरी है।कभी -कभी इस तरह के गभीर रिश्ते हमें अँधा बना देते हैं। जिसके कारण हम अपने अपनों को कभी -कभी उनकी सपनों से वंचित करते हैं। कोई पाठक है जिनके अभिभावकों ने आपको घर से दूर जाने की इजाजत नहीं दी है ,पढ़ने के लिए ,आपके चाहते हुए भी। मैंने अपनी ज़िन्दगी में कई पिता को देखा है अपनी बिटिया को वंचित करते हुए ऐसी परिस्थितियों में। क्यों बच्चे अपने सपनो को न्योछावर करेंगे ,आपकी भावनाओं की खातिर। अगर कोई अभिभावक इस वक़्त मेरा यह लेख पढ़ रहें हैं ;मैं उनसे निवेदन करूँगा की बच्चों को उनके सपने को सच करने का मौका दें -रिश्तों का लिहाज़ तभी होता है।
इस लेख को लिखते वक़्त मुझे अपने माता -पिता की याद आ रही है। ज़रूर वह अपनी दुनिया से अपने नाति का मार्ग दर्शन कर रहें हैं। उनके आशीर्वाद के बिना कुछ संभव नहीं है। अगर वह इस दुनिया में होते तो गर्व से सबको बताते। एक विषय के बारे में मैं शत प्रतिशत कॉंफिडेंट हूँ -वह नाति को कभी भी हमसे इतना दूर पढ़ने जाने से नहीं रोकते। क्योंकि  उन्होंने ३७ साल पहले अपने इकलौते संतान को सोलह साल की नाजुक उम्र में पढ़ने के लिए बिहार के छोटे शहर से मद्रास जाने से नहीं रोका था। उन दिनों पोस्टकार्ड पर पत्र लिखने के अलावा योगायोग के साधन बहुत सीमित थे। इंडियन एयरलाइन्स के कुछ फ्लाइट हुआ करते थे ,बड़े शहरों के बीच ;ट्रंक -कॉल बुक करना पड़ता था ,फ़ोन पर बात करने के लिए। जमालपुर से मद्रास पहुँचने मे अड़तालीस घण्टे का समय लगता था। आज मैं जो कुछ भी हूँ ,अपने माता -पिता के निस्वार्थ निर्णय के कारण -अपने दिल और भावनाओं पर पत्थर रख कर मुझे मद्रास जाने का अनुमति देना। बाबा -माँ ,आज मैं महसूस कर रहा हूँ आपके भावनाओं को जब मैं खुद उन भावनाओं से गुज़र रहा हूँ। अभी तो टेक्नोलॉजी के कारण योगायोग के उपाय हमारे मुट्ठी में हैं। फिर भी मेरी उदासी आपके दिल में हो रही उथल -पुथल का एहसास दिला रही है जब मैंने घर छोड़ा था ३७ साल पहले। धन्यवाद आप दोनों को आपके निर्णय के लिए।
थोड़ा भावुक हो गया हूँ। पिछले दिनों मैं मैडम रीता बिबरा जी से बात कर रहा था। रीता जी कई स्कूल और कॉलेज को मैनेज करती है। मैं उनका फैन हूँ -उनके जीवन दर्शन के कारण। उनसे बात हो रही थी इस सन्दर्भ में। मैंने कहा कि हर इंसान अपने चुने हुए रास्ते पर सफर करता है। और अंत में जो होता है ,अच्छा ही होता है। रीता जी ने मेरी सोच ठीक कर दी। उन्होंने कहा -रास्ता हमने नहीं चुना है ;ऊपर वाले ने हमारे लिए चुना है। और उनके लिए हम सब एक हैं। धन्यवाद रीता जी मेरे जीवन का मार्ग दर्शन को नई दिशा देने के लिए। आपका मैं आभारी रहूँगा।
 इन दिनों रीता जी की तरह कई लोगों ने अपने सोच से मुझे प्रभावित किया है ,ज़िन्दगी को नए अंदाज़ में जीने के लिए। उन सबके विषय में लिखूँगा आगे के सफर में. साथ निभाईएगा हमारा ?


गुरुवार, 3 अगस्त 2017

नमस्कार।  कैसे हैं आप ?कैसा चल रहा है आपका ब्रैंड बिल्डिंग का प्रयास ?पिछले महीने में मैंने ब्रैंडिंग के CDE का ज़िक्र किया था और ब्रैंड क्रिएशन के विषय में विस्तृत बात चीत की थी। याद है आपको ? ब्रैंड क्रिएशन में पांच चीज़ों का ख्याल रखना परता है।

  • कोई भी ब्रैंड हर किसी के लिए नहीं होता है। 
  • ब्रैंड एक रिश्ता है।  जिसके साथ ब्रैंड रिश्ता जोड़ना चाहता है उसको रिश्ते से क्या मिलेगा ?
  • अपने ब्रैंड का परिचय या आइडेंटिटी क्या है ?
  • आपका ब्रैंड प्रॉमिस क्या है ?
  • One never gets a second chance to create the first impression .इसके लिए आपका कम्युनिकेशन और ग्रूमिंग महत्वपूर्ण है। 
आज हम चर्चा करेंगे ब्रैंड development का। आपने ऊपर बताई गई पांच बातों का निर्णय ले लिया है और अब आप तैयार हैं अपने ब्रैंड को आगे बढ़ाने के लिए। चूँकि ब्रैंड एक रिश्ता है जितने लोग आपके ब्रैंड से जुड़ेंगे उतना ही आपके ब्रैंड का डेवलपमेंट होगा। बात इतनी सहज है। इसके लिए आपको क्या करना पड़ेगा ?

कोका कोला को विश्व का सबसे मूल्यवान या वैल्युएबल ब्रैंड माना जाता है। एक मीडिया इंटरैक्शन में कोका कोला कंपनी के चेयरमैन ने  इस सफलता के पीछे एक सरल प्रयास का ज़िक्र किया था - उनकी कंपनी का ब्रैंड डेवलपमेंट का एकमात्र उपाय है अधिक से अधिक लोगों को कोका कोला पीने के लिए मोटिवेट करना।  जितने अधिक लोग कोका कोला पियेंगे उतना ही ब्रैंड वैल्यूएशन बढ़ेगा। 

इस कोका कोला के उदाहरण से मिलती है हमारी पहली सीख -keep it simple
 इस गतिमय ज़िंदगी के सफर में किसी के पास आपके ब्रैंड और ब्रैंड प्रॉमिस को समझने के लिए समय नहीं है। आपका  ब्रैंड क्या कर सकता है -उनके लिए जिनके साथ आपका ब्रैंड रिश्ता जोड़ना चाहता है -उनको यह समझने में कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए। इसका एक बेहतरीन उदाहरण है - Google. Google के प्रतिष्ठाताओं ने यह समझा कि हर वक्ति को  यह पता है कि वह क्या ढूंढ रहा है -उसे यह नहीं मालूम ढूढ़ना कहाँ है !इसी का प्रॉमिस किया Google ने। कुछ भी ढूढ़ना हो -Google करो !
दूसरी सीख Google से है -जो वादा किया निभाओ , लोग तुम्हारे ब्रैंड की पब्लिसिटी खुद करेंगे। Google के विषय में आपने पहली बार कैसे जाना ?शायद आपको याद भी नहीं होगा। जरूर किसी से सुना होगा जिसने आपसे पहले गूगल को एक्सपीरियंस किया होगा। आप अपने कर्तव्यों से अपना ब्रैंड बनाते हो। अपने पड़ोस में जरूर कोई ऐसा इंसान है  जिस  पर लोगों का आस्था होगा किसी भी प्रकार के मदत के लिए। यही उस व्यक्ति का ब्रैंड आइडेंटिटी और प्रॉमिस है। आपने यह भी देखा होगा कि इस व्यक्ति से कोई भी बिना किसी झिझक के सहायता मांगता है। क्यों ? क्योंकि यह व्यक्ति कभी भी ,कहीं भी मदत करने के लिए तत्पर है। गूगल की तरह। इसी से मिलती है हमारी तीसरी सीख
कंसिस्टेंसी परफॉरमेंस का -ज़रा सोचिये -आपके किसी मित्र ने आपके शहर के किसी रेस्टोरेंट में खाना खाकर उसकी काफी प्रशंषा की और आप अपने परिवार के साथ उस रेस्टोरेंट में खाने के लिए गए। उस दिन किसी कारण रेस्टोरेंट का हर खाना खराब रहा। क्या आप फिर वहाँ जाओगे ? खुद तो नहीं जाओगे ;अपने परिचित लोगों को वहाँ जाने से रोकोगे। कोई इंसान इन्कन्सीस्टेन्ट परफ़ॉर्मर के साथ रिश्ता जोड़ना नहीं चाहता है -भरोसा नहीं मिलता है। क्रिकेट में सचिन तेंडुलकर क्यों इतना बड़ा ब्रैंड है -क्योंकि १२० करोड़ भारत वासिओं का उन पर आस्था है। जो क्रिकेटर ने जितनी कंसिस्टेंसी से परफॉर्म किया है ;उतना ही बड़ा ब्रैंड बना है। एक और ब्रैंड है राहुल द्रविड़।
हमारी अगली सीख राहुल द्रविड़ से है -बदलते हुए  ज़रूरतों के साथ अपने ब्रैंड को भी बदलना पड़ेगा। 
आपको याद होगा उनके कैरियर के शुरुआत में राहुल द्रविड़ को  वन डे क्रिकेट के लिए अनसूटेबल माना जाता था। १९९९ के पहले उन्हें भारत के एक दिवसीय टीम से बाहर रखा गया था। उन्होंने कड़ी मेहनत की ;टीम में वापसी की और इतना ही नहीं; इंग्लैंड में खेले गए वर्ल्ड कप टूर्नामेंट के सर्वाधिक रन स्कोरर भी बने। कुछ दिनों पहले आपने उनकी सफलता IPL में भी देखी।
इसी से हमारी आखरी सीख आती है -आपका ब्रैंड ambition क्या है ?आप अपने ब्रैंड को किस मंज़िल पर ले जाना चाहते हो? हर गंतव्य के साथ आपको यह भी निर्धारित करना पड़ेगा कि आप कितने समय में और कैसे अपनी मंज़िल तक पहुचेंगे। कुछ इस तरह जैसे आप अपने घर  से रेलवे स्टेशन पहुँचते हो ट्रेन पकड़ने के लिए।
ब्रैंड एम्बिशन के उदाहरण स्वरुप मैं एक व्यक्तिगत अनुभव का ज़िक्र करना चाहता हूँ। पिछले सप्ताह मैं काम के सिलसिले में मुंबई गया था। वहाँ मैंने एयरपोर्ट से शहर तक का सफर 'प्रियदर्शिनी -वोमन पॉवर' टैक्सी में किया। वाहन चालक सनोवर नाम की एक महिला थी। सनोवर दिन में टैक्सी चलाती है और रात में अपने दो बच्चो और पति के लिए घर में खाना बनाना ,बच्चों को पढ़ाना और घर की और सब काम करती है। सनोवर से बात करने पर उन्होंने बताया कि बचपन से ही उनको गाड़ियों में बहुत दिलचस्पी थी और एक दिन गाड़ी चलाने का सपना देखती थी। एक गरीब परिवार के सदस्य होने की वजह से  कई लोगों ने उनको अपने इस सपने को भूल जाने कि सलाह दी. क्योंकि उनका सपना सार्थक होने का  संभावना काफी कम था । सनोवर ने हार नहीं मानी।
सनोवर ने गाड़ी चलाने और सेल्फ डिफेन्स का तालिम लिया जो कि 'वोमन पॉवर' ड्राइवर बनने का क्राइटेरिया था। उनकी सफलता पर मुबारक़ देने पर उन्होंने पूरा श्रेय अपने पति और बच्चों को दिया जिनके समर्थन के बिना यह संभव नहीं हो पाता ।
मेरे लिए सनोवर एक ब्रैंड का उत्कृष्ट मिसाल है। यह प्रमाण करती है कि सपने के साथ अपनों का साथ हो और सफलता पाने का पैशन हो तो कुछ भी हो सकता है।
क्या आप प्रेरित हैं अपने ब्रैंड क़ो आगे बढ़ाने का ?
नए साल संकल्प बनाने  का सर्वश्रेष्ठ अवसर माना जाता है। अगले साल आप अपने ब्रैंड को किस दिशा में आगे बढ़ाना चाहते हैं तय कर लीजिये। मंज़िल की ओर यात्रा शुरू करने का प्लानिंग इन कुछ दिनों में ही करना पड़ेगा। आपकी यात्रा सफल हो -यही हमारी शुभकामना है आपके लिए, नए साल का।

नमस्कार। नया साल मुबारक हो आपको और आपके चाहने वालों को। इन  चार दिनों में आपने क्या कुछ ऐसे लोगों के साथ सम्पर्क स्थापित किया जिनके साथ आपका वार्तालाप किसी ऐसे अवसर पर होता है जैसे कि कोई त्योहार या नया साल ?क्यों हम ऐसा करते हैं ? क्योंकि हम अपना रिश्ता ऐसे लोगों के साथ बरकरार रखना चाहते हैं। ताकि आपका ब्रैंड उनके दिमाग में ताज़ा रहे।
पिछले दो महीनों में मैंने आपसे ब्रैंड creation और development का ज़िक्र किया था। आज मैं आपके साथ ब्रैंड engagement के विषय में चर्चा करूँगा।
ब्रैंड एक रिश्ता है चॉइस का। हमने ब्रैंड को इसी तरह से समझा है। खुद को एक ब्रैंड के हैसियत से आगे बढ़ाने के लिए अपने चुने हुए 'सर्कल ऑफ़ इन्फ्लुएंस' में मौजूद लोगों को अपने ब्रैंड में इंटरेस्टेड रखना अति आवश्यक  है। इसे हम ब्रैंड engagement कहते हैं। एक सत्य का ख्याल सदा रखियेगा -आपका ब्रैंड लोगों के दिल में तब तक विराज करेगा जब तक आपका ब्रैंड उनके लिए relevant या तात्पर्य पूर्ण है।
अपने ब्रैंड engagement के लिए अंग्रेजी के पाँच vowels - a ,e ,i ,o ,u -का प्रयोग कीजिये। आगे विस्तार में।
A - Accessibility- जिनसे हम रिश्ता बनाना चाहते हैं उनको ज़रुरत के समय ना मिलने पर हम निराश हो जाते हैं। एक दो बार ना मिलने पर हम रिश्ता बरक़रार रखने का प्रयास छोड़ देते हैं। यही है आपके ब्रैंड का accessibility. आपके शहर में ज़रूर कोई ऐसा डॉक्टर होगा जिसको हर कोई दिखाना चाहता है लेकिन महीनो तक अपॉइंटमेंट नहीं मिलता है। क्या आप उनके लिए इंतज़ार करते हैं या विकल्प ढूढ़ते हैं ? Accessibility के कारण किसी  दूसरे  डॉक्टर को अपना ब्रैंड बनाने में सहायता मिलता है।
E-Evolve- समय के साथ अपने ब्रैंड को परिवर्तन करना अपने ब्रैंड के अस्तित्व का मूल मंत्र है। ज़माना और उसकी ज़रूरतें बहुत तेज़ी से बदल रही हैं। अपना ब्रैंड relevance बरक़रार रखने के लिए यह आपकी मजबूरी है। Nokia एक समय हमारे देश का सर्वाधिक बिकने वाला मोबाइल हैंडसेट हुआ करता था। कहाँ है अब वो ? उसने बदलते हुए ज़रुरत को समझने में नासमझी की जिसके कारण लोगों ने Nokia के साथ रिश्ता तोड़ दिया।
I -Innovation -आप जितना relevant innovation कर पाओगे उतना ही लोग आपके साथ जुड़े रहेंगे। यही लोग और भी लोगों को आपके ब्रैंड के साथ जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। Apple इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। IPL क्रिकेट के लिए एक ऐसा ही innovation है। हमारे प्रधान मंत्री का रेडियो प्रोग्राम -मन की बात -एक बेहतरीन प्रयास है।
O-Openness-अगर आपके ब्रैंड को आगे बढ़ाना है तो आपको समालोचना का समुख्खिन होना पड़ेगा। लोग प्रशंषा के साथ निंदा भी करेंगे। आप निंदा को किसी भी हालत में नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं। कहा जाता है कि Oberoi होटेल्स के प्रतिष्ठाता ग्राहक के हर नेगेटिव मंतव्य का विश्लेषण खुद करते हैं और उसका समाधान ढूढ़ते हैं। उनका मानना है कि एक ग्राहक जिसने मेहनत किया है उनको फीडबैक देने का असल में और ९९९ ग्राहकों का प्रतिनिधित्व कर रहा जिन्होंने फीडबैक देने का मेहनत नहीं किया है।
U-Unlearn-कभी -कभी हम अपने नॉलेज और तजुर्बे का गुलाम बन जाते हैं। फलस्वरूप हम अपने आप को बदल नहीं पाते हैं। मैंने कई युवा को एक गलती करते हुए अक्सर देखा है -कॉलेज के बाद नौकरी करते समय खुद को ना बदलना। कई चीज़ें हम कैंपस में करते हैं जो कि हम ऑफिस में नहीं कर सकते हैं या हमें उसी चीज़ को नए अंदाज़ में करना सीखना परता है -जो आसानी से कर पाते हैं उनका ब्रैंड ऑफिस में जल्दी बनता है।
आखिर ब्रैंड एक रिश्ता है और आपको लोगों को सर्वदा वजह देना पड़ेगा आपके साथ रिश्ता बनाये रखने का -जितना आप engagement बढ़ा सकिएगा उतना ही आपका ब्रैंड मजबूत बनता जायेगा। और मजबूती ही आपके ब्रैंड का आयु निर्णय करेगा।
कैसा लगा आपको ब्रैंड के C-D-E के विशय में जानकार  ? मुझे Facebook पर ज़रूर लिखिए आपके बहुमूल्य सुझाव के साथ।
 अगले महीने से मैं आपके साथ कम्युनिकेशन के विषय में चर्चा करूंगा जो किसी ब्रैंड के लिए एक महत्वपूर्ण कला है -ब्रैंड बनाने और आगे बढ़ाने के लिए।
२०१६ आपके ब्रैंड के लिए मंगलमय और आनंदमय हो-यही मेरी शुभकामना है। मिलते रहेंगे।
नमस्कार। कैसा लग रहा है गर्मी का यह मौसम। स्कूल की छुट्टियाँ , आम का आनंद और गर्मी के कारन पसीने का अत्याचार। इस मौसम में शुद्ध ठंडे पानी का कोई विकल्प नहीं है। अधिकतर लोग दोपहर में धूप से और किसी -किसी शहर में गर्म लू से बचने के लिए घर या ऑफिस के बाहर नहीं निकलते हैं। तब तक, जब तक धूप में निकलना अति आवश्यक ना हो जाए।
इसी गर्मी के मौसम एक शनिवार आपका बॉस आपको रविवार के दिन दोपहर एक बजे ऑफिस में एक मीटिंग के लिए बुलाता है। आपको पता है कि मीटिंग का विषय ऐसा महत्वपूर्ण नहीं है कि आप इतनी गर्मी में छुट्टी के दिन, घर से एक घंटे का सफर तय करके ऑफिस पहुँचे। केवल यही नहीं। आपने अपने परिवार के साथ दोपहर तीन बजे के शो में घर के पास सिनेमा हॉल में नई फिल्म देखने का प्लान बनाया है। वातानुकूलित हॉल का सुकून और नई फिल्म का आनंद। रविवार ऐसा ही होना चाहिए। सब प्लानिंग पर बॉस का पानी फेर देना। क्या करेंगे आप ? इंक्रीमेंट, प्रोमोशन और कैरियर तीनों बॉस पर निर्भर करता है। ज़िंदगी में कभी ऐसी दुविधा हुई है ? बीच में आप और एक कठिन निर्णय -एक को 'हाँ ' तो दूसरा नाराज़।
आप इस परिस्थिति में क्या कर सकते हैं ? क्या सोच रहें हैं ? बॉस , कैरियर या परिवार ? या बॉस और परिवार , दोनों ? कम्युनिकेशन का यह सबसे कठिन चुनौती है। आज इसी का चर्चा करेंगे।
आप शायद मेरे साथ सहमत होंगे कि हर इंसान को माँगने का हक़ है तो किसी की माँग को नकारने का अधिकार भी है। आपके बॉस के पास आपको छुट्टी के दिन काम पे बुलाने का जैसा अधिकार है , आपको छुट्टी के दिन परिवार के साथ दोपहर में फिल्म देखने का अधिकार भी है। किसके अधिकार का आप इज्जत करेंगे -आपके खुद का या दूसरे इंसान का ? इसी पर निर्भर करता है , आपका कम्युनिकेशन और उस कम्युनिकेशन पर आपका रिश्ता। और रिश्ता क्या बनाता है ? आपका ब्रैंड।
तीन संभावनाएं आपके सम्मुख है। आप अपने बॉस के अधिकार को अपने अधिकार से ज़्यादा महत्व दो और रविवार के दिन दोपहर में ऑफिस पहुँच जाओ। यह आपका पैसिव कम्युनिकेशन होगा। ज़रा सोचिये। क्या आप खुद खुश होंगे ? कहाँ वातानुकूलित सिनेमा हॉल का सुकून के जगह  गर्मी में एक घंटे का सफर। क्या आपके परिवार वाले खुश होंगे ? परिवार को किए हुए वादे को ना निभाने का मानसिक तनाव क्या आपको काम करने में मदत करेगा ? हर्गिज़ नहीं।  आपके काम से क्या बॉस खुश होगा ? देखिये आपके पैसिव कम्युनिकेशन के कारण हर इंसान नाखुश है -बॉस , आपका परिवार और आप खुद। आपका अपने बॉस और परिवार के साथ रिश्ता बेहतर होगा या बदतर ? और आपका ब्रैंड ?
दूसरा उपाय है कि आप अपने अधिकार को बॉस के अधिकार से अधिक महत्व दो और रविवार को ऑफिस जाने से इंकार कर दो। यह एग्रेसिव कम्युनिकेशन का मिसाल होगा। क्या  बॉस खुश होगा ? आप चैन के साथ फिल्म का आनंद ले सकोगे ?
तीसरा संभावना कम्युनिकेशन का सबसे कठिन, लेकिन बेहतरीन कौशल है। इस कुशलता को प्राप्त करने के लिए लगातार प्रयास करना पड़ेगा।  इस कम्युनिकेशन को assertive कम्युनिकेशन कहते हैं। सहज भाषा में -अपना और दूसरों के अधिकार को सम्मान करो। जहाँ 'ना 'बोलना ज़रूरी है , बोलो। 'हाँ 'मत बोलो। परंतु ऐसे बोलो कि सुनने वाला आपके और खुद के अधिकार का सम्मान करे और आपके 'ना 'बोलने के कारण को सराहे। assertive कम्युनिकेशन ज़िन्दगी का एक अहम् कौशल है जिसका प्रयोग व्यक्तिगत , सामाजिक और प्रोफेशनल रिश्तों को आगे बढ़ाने में मदत करता है। आप गौर कीजिएगा रामायण और महाभारत में assertive कम्युनिकेशन का घटनाओं पर प्रभाव। assertive ना होने का और होने का।
assertive कम्युनिकेशन करने का तरीका क्या है? सहज उपाय। लेकिन सीखने और प्रयोग करने में कठिन।
पहली बात -सुनो। क्या बोलना चाहता है ? क्या आप समझ पा रहे हो जो कि नही बोला जा रहा है ?
दूसरी बात -समझो। ज़रुरत होने पर प्रश्न पूछो।
तीसरी बात -अपना कारण व्यक्त करते हुए 'ना 'बोलो।
चौथी बात -ऐसा समाधान ढूंढो जो कि दोनो के अधिकार का सम्मान करता हो।
पाँचवी बात -तय किए हुए वादे को निभाओ
शुरू के उदाहरण को एक वार्तालाप के माध्यम से पेश करते हैं।
बॉस -आप कल रविवार दोपहर दो बजे ऑफिस आ जाइएगा।  काम है।
आप -sir मैं बेशक आ जाता परंतु मैंने अपने परिवार के साथ दोपहर में एक फिल्म देखने का प्रोग्राम बनाया है जिसके लिए मेरा कल दोपहर में ऑफिस आना संभव नही है। sir काम क्या है अगर आप बताएं तो मैं उस काम को करने का कोई उपाय ढूंढ सकता हूँ।
बॉस -मुझे इस महीने का रिपोर्ट भेजना है।
आप -sir , मैं घर पर काम करके आपका रिपोर्ट e mail के ज़रिये कल दोपहर के पहले भेज दूँगा। इससे आपका  काम भी हो जाएगा और मैं अपने परिवार को निराश भी नहीं करूँगा।
इस वार्तालाप को करते वक़्त कम्युनिकेशन के नियमों का ख्याल रखिएगा जरूर। याद है ना। 55 -38 -7 प्रतिशत का फार्मूला। आपका चेहरा और शरीर क्या बोल रहा है (55 %); किस अंदाज़ से आप बोल रहे हो (38 %) और आपके शब्दों का चयन (7 %).
कोशिश कीजिये assertive कम्युनिकेशन और मेरे साथ फेसबुक के माध्यम से शेयर कीजिये। सबसे बेहतरीन मिसाल मैं अगले महीने doc -u -mantra में पेश करूँगा। आपके नाम के साथ। वादा रहा। आम और रिश्तों का आनंद लीजिए।  खुश रहिए।  फेसबुक पर आपका इंतज़ार करूंगा। 
नमस्कार। पिछले महीने के लेख में मैंने चैंपियंस ट्रॉफी के विषय में जिक्र किया था। आपने फाइनल मैच देखा ?भारतीय टीम मैच हार गई। बूरी तरह से। हमारे कप्तान ने विपक्ष के विजयी टीम को सराहा। स्वीकार किया कि उन्होंने फाइनल में बेहतर खेला। इसके कुछ दिन बाद भारत के क्रिकेट टीम के कोच ने इस्तफ़ा दे दिया। ख़बरों के अनुसार उन्होंने भारतीय खिलाड़ी के पास फाइनल के बुरे परफॉरमेंस पर जवाब माँगा। हमारे कोच भी भारत के सफल खिलाडी रह चुके हैं और उन्होंने काफी लंबे समय के लिए भारत के टीम का अभिन्न हिस्सा रह चुके हैं। आज मैं क्रिकेट के विषय में नहीं ,रिश्तों के विषय में लिखूँगा।
कप्तान और कोच क्योँ अलग हो गए ? साथ में उनका प्रदर्शन क्रिकेट की दुनिया में सर्वश्रेष्ठ रहा। आँकड़े बताते हैं कि भारतीय टीम का विजय प्रतिशत शायद इतना अच्छा कभी नहीं रहा। तो फिर क्योँ अलग हो गए दोनों ? असल बात मुझे पता नहीं है। मैंने केवल संबाद माध्यम के जरिए सुना और समझा है ,उसके आधार पर रिश्तों के जुड़ने और टूटने पर टिप्पणी करूँगा।
कहा जाता है एक म्यान में आप दो तलवार नहीँ रख सकते हैं। शायद यही हुआ है भारतीय टीम के लिए। दो दिग्गज ,बेहतरीन खिलाड़ी। दोनों के स्वाधीन विचार। मत विरोध। एक दूसरे को जगह नहीं छोड़ना। नतीजा -म्यान में एक ही तलवार। कौन सही ,कौन गलत। पता नहीं। लेकिन पहली सीख किसी भी रिश्ते में एक दूसरे को पर्याप्त स्वाधीनता देना रिश्ते के लिए महत्वपूर्ण है।
घर में सोचिए -पति -पत्नी का रिश्ता। बच्चो का माता -पिता के साथ रिश्ता। दोस्ती में रिश्ता। क्या हम एक दूसरे को उतना जगह और स्वाधीनता देतें हैं जितना कि उस रिश्ते को जरूरत है ? मेरा तजुर्बा यह कहता है कि बुजुर्ग अक्सर बच्चोँ को उतनी स्वाधीनता नहीं देतें हैं जितना कि बढ़ते हुए बच्चोँ की जरूरत है। बच्चे बुजुर्गों के नज़र में बच्चे ही रह जाते चाहे उनकी उम्र कॉलेज के लायक क्यूँ न हो जाए।
इस वजह से काफी अभिभावक अपने बच्चो पर अपने निर्धारित किये हुए कैरियर थोप देतें हैं। उनका सोचना है कि उनकी जानकारी और निर्णय करने की क्षमता उनके बच्चोँ से बेहतर है चूकि उन्होंने जिंदगी को ज्यादा देखा है।
क्यों हम स्वाधीनता नहीं देते हैं ? क्योंकि हम दूसरे को रिश्ते में अपने बरोबर का नहीं समझते हैं। अभी भी कई पति अपने आप को अपनी पत्नी से ऊपर समझता है। पति जो बोलेगा पत्नी को सुनना पड़ेगा। यह ठीक नहीं है। एक पति -पत्नी के रिश्ते में दोनों का समान हक़ और जिम्मेवारी है। आश्चर्य वाली बात यह है कि जिनकी पत्नी काम करती है ,उनके पति भी उतना ही अपने आप को ऊँचा समझता है जितना कि ना काम करने वाली पत्नी का।
यही 'मैं उनसे बेहतर 'विश्वास के कारण हम दूसरों से अपने प्रति ज़्यादा श्रद्धा की उम्मीद करते हैं। शिक्षा प्रदान करने वाले अक्सर इस तरह से सोचते हैं। जैसे कि ऑफिस में बॉस अपने टीम के लोगों से उसी तरह का उम्मीद रखता है। और यही कारण बन जाता है रिश्तों में दरार का। किसी भी रिश्ते का नीव है पारस्परिक श्रद्धा। अगर आप श्रद्धा नहीं करोगे। आपको श्रद्धा नहीं मिलेगा। परंतु लोग इस बात को अक्सर नज़र अंदाज़ कर देते हैं।
किसी भी रिश्ते में मत विरोध होना कोई अस्वाभाविक बात नहीं है। ऐसे समय पर आपस में बात-चीत करके समस्या का समाधान ढूंढ लेना ही समझदारी वाली बात होती है। मुश्किल है कि कौन पहले बात को छेड़ेगा। यहाँ फिर कौन छोटा या कौन बड़ा का प्रश्न आ जाता है। किसी भी समस्या या मत -विरोध का अगर जल्दी समाधान ना ढूंढा जाए तो बात और बिगड़ जाती है।
दूसरों की इज्जत कीजिए , दूसरों को रिश्ते में जगह दीजिए देखिएगा आपके रिश्ते कितने मजबूत बनते जाते हैं। इस लेख के जरिए मैं भी आप लोगों से रिश्ता जोड़ने की कोशिश कर रहा हूँ। आपकी मैं इज्जत करता हूँ और अहम् दिल से विश्वास करता हूँ कि मैं आप सभी से मैं सीख सकता हूँ। आइए फेसबुक के माध्यम से मिलते हैं अपने रिश्ते को और मजबूत बनाने के लिए। इंतज़ार करूँगा।